Monday, November 10, 2014

हॉलमार्क के बावजूद जूलरी में कम गोल्ड

दिनेश माहेश्वरी
 कोटा।  इंडियन कस्टमर्स जो भी गोल्ड जूलरी खरीदते हैं, उसमें उतना गोल्ड नहीं होता है जितना कि उन्हें बताया जाता है। रिफाइनिंग कंपनी के मुताबिक उन्हें प्रोसेसिंग के लिए जो स्क्रैप गोल्ड मुहैया कराया जाता है, उसमें 80 पर्सेंट ही गोल्ड होता है जो 22 कैरेट गोल्ड जूलरी का स्टैंडर्ड है। ब्यूरो ऑफ इंडियन स्टैंडर्ड्स के अधिकारी भी इससे सहमत हैं। अधिकारियों ने कहा कि शहरों के कई रिटेलर्स जो हॉल मार्क सर्टिफिकेशंस का दावा कर गोल्ड प्रॉडक्ट बेचते हैं, उनमें भी गोल्ड कंटेंट कम होता है।
एमएमटीसी पीएएमपी के मैनेजिंग डायरेक्टर राजेश खोसला ने कहा, 'हमें रिफाइनिंग के लिए स्क्रैप के फॉर्म में गोल्ड मिलता है। औसतन इसमें गोल्ड की मात्रा 80 से 85 पर्सेंट के बीच होती है।' खोसला ने कहा कि जूलरी खरीदने के दौरान अभी भी इंडियन कंज्यूमर्स को काफी सावधानी बरतनी पड़ती है। उन्होंने कहा, 'भारत में बिकने वाली जूलरी हाई कैरेट की होती है। इस वजह से गोल्ड कंटेंट की भूमिका बढ़ जाती है। वहीं पश्चिमी बाजारों में ऐसी कोई समस्या नहीं है क्योंकि वहां बिकने वाली जूलरी 12 से 14 कैरेट वाली होती है।' खोसला बताते हैं कि इंडियन कंज्यूमर्स को गोल्ड जूलरी खरीदने के समय अगल से मेकिंग चार्जेज का भुगतान करना पड़ता है और ऐसे में गोल्ड कंटेंट के मामले को यूं ही नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
ब्यूरो ऑफ इंडिया स्टैंडर्ड्स की योजना हरेक हॉलमार्क आइटम के लिए यूनीक आईडी मुहैया कराने की है ताकि डुप्लिकेशन पर रोक लगाए जाने के साथ ही गोल्ड कंटेंट का पता लगाया जा सके। बीआईएस ने कहा कि ज्वैलरी में कम गोल्ड कंटेंट का होना अब आम बात है। बीआईएस के डायरेक्टर जनरल सुनील सोनी ने कहा, 'रैंडम सैंपलिंग के तहत बाजार से 18-20 पर्सेंट सैंपल कलेक्ट किए गए और उन सभी गोल्ड कंटेंट कम था, जो एजेंसी के मानकों के मुताबिक नहीं थे।' सोनी ने कहा कि कंटेंट अधिक होने के बाद उन्होंने इसे घटाकर कम कर दिया। सोनी ने कहा, 'इससे पहले हमारे पास ज्वैलर या हॉलमार्किंग सेंटर का लाइसेंस रद्द करने का अधिकार था, लेकिन वह काफी नहीं है। अब हम जूलरी में कम गोल्ड होने की स्थिति में गोल्ड कंटेंट के तीन गुने के बराबर पेनाल्टी लगा रहे हैं।' उन्होंने कहा कि इससे कंज्यूमर्स के हितों को सुरक्षित रखने में मदद मिलेगी।
खोसला ने कहा कि दुबई में गोल्ड खरीदते समय कस्टमर्स को ऐसी समस्याओं का सामना नहीं करना पड़ता, क्योंकि वहां कम कंटेंट होने पर भारी जुर्माना देना पड़ता है। जुर्माने की भारी रकम को देखते हुए कोई भी गोल्ड कंटेंट के साथ छेड़छाड़ करने की हिम्मत नहीं करता। खोसला ने कहा कि हॉलमार्किंग सिस्टम स्टैटिस्टीकल सैंपलिंग पर आधारित है और इस वजह से इसमें खामी की गुंजाइश बनी रहती है।

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